Saturday, March 5, 2016

हमारी मानव जाति

    


 मुझे कुछ न कुछ पढ़ते रहने का शौक  है।  पिछले कुछ दशकों से पढ़ने की रुचि फिक्शन (कथा साहित्य  ) से हटकर नॉन फिक्शन (कथेतर ) पुस्तकों  की तरफ मुड़ गयी/गई है। 

  अकसर लोगों का पढ़ने का दायरा सीमित ही रहता है. लोग एक ही प्रकार की पुस्तकें  जैसे सामाजिक या राजनीतिक या रोमांटिक पुस्तकें पढ़ते रहते हैं. इसमें कोई बुराई नहीं है. आखिर सबको अपनी अपनी पसंदकी पुस्तकें पढ़ने का पूरा अधिकार  है. मगर मैंने कहीं पढ़ा था हर एक को कभी कभीएकदमअलगविषयकी पुस्तक पढ़ लेनी चाहिए. इससे आपको एक नए आयाम की अनुभूति होगी और आपकी सोच का दायरा भी बढ़ेगा।और अगर आपको लिखने का शौक हो तब तो यह आपके लिए और भी अच्छा है। 

इसी सोच के तहत जब पक्षियों  के बारे में लिखी अंग्रेजीकी एक किताब मेरे हाथ लगी तो मैंने उसे  पढ़ने की ठान ली.पढ़कर पक्षियों  के बारे में तो अच्छीजानकारी तो मिली ही पर पुस्तक  की प्रस्तावना में  मुझे एक नई ​व बहुत महत्त्वपूर्ण बात जानने को मिली जो मैं यहाँ आपको बताना चाहता हूँ। 

यह तो सर्वविदित है कि हमारी पूरी पृथ्वी एक इकोलॉजिकल सिस्टम (पारिस्थितिक तंत्र ) में बंधी हुई है जिसमे सारी सजीव वस्तुएं एक दुसरे पर पर निर्भर हैं. वनस्पति जगत,प्राणी जगत (जिसमे हम सब और जंतु जगत शामिल है),पक्षी जगत,कीड़े मकोड़ों का जगत सब एक दुसरे से जुड़े हुए हैं.जंतुओं व पक्षियों को घास,पत्तियाँ ,बीज और फल चाहिए. पशुपक्षी बीजों को दूर दूर  तक वितरित करके वनस्पति जगत की सहायता करते हैं। ये सारे आपस में जुड़े हुए हैं। इसके आलावा भूमि.समुद्र,नदियां,जंगल भी पारिस्थितिक तंत्र में एक अहम भूमिका निभाते हैं। 

ये सभी जगत एक दूसरे पर इस हद तक आश्रित हैं कि अगर किसी कारणवश इन में से कोई एक भी जगत नष्ट हो जाये तो पूरा संतुलन डगमगा जायेगा और दूसरे  जगत भी पनपने नहीं पाएंगे। शायद कुछ दशकों के बाद उनका नामोनिशान ही मिट जायेगा।

अब रही मानव जगत की बात। हम लोग भी पशुपक्षी व वनस्पति जगत पर काफी निर्भर हैं। अगर संपूर्ण मानव जाति नष्ट हो जाये तो अन्य जगतों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. बल्कि ये सारे ज़्यादा फलेंगे और फूलेंगे क्योंकि मानव हमेशा इनका नाश ही करता आया है। इनका ही नहीं ,मानव तो भूमि,हवा ,नदी,समुद्र और वन समूह का भी बहुत तेज़ी ध्वंस करता आया है। 


और अगर मानव को अभी भी समझ नहीं आई तो उसका विनाश निश्चित है. अब सवाल यह उठता है अगर मानव जाति इतनी उपयोगहीन और विनाशकारी  है तो किस बूते पर हम अपने को तीसमारखां समझते  है?


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