कुछ वर्ष पूर्व एक साहित्यिक समारोह (लिटरेरी फेस्ट ) में भाग लेने का मौका मिला था। चर्चा इस बात पर हो रही थी कि आजकल बच्चों के उपयुक्त सही पुस्तकों की कमी है। कुछ बाल सहित्य मिल भी जाये तो माँ माता -पिता अपनी अपनी दिनचर्या में इतने व्यस्त हैं की बच्चों को बिठाकर कुछ पढ़कर सुनना तो दूर,उनके साथ बैठकर दो घड़ी समय बिताने का समय भी नहीं निकल पाते। जहाँ तक पारम्परिक और पौराणिक कथाओं का सवाल है उनपर आधारित सीरियल्स व डीवीडी आसानी से मिल जातें हैं। ऑनलाइन भी बहुत कुछ उपलब्ध हैं। बस बच्चों को टीवी या कंप्यूटर के सामने बिठा दो और देखने दो। साथ में खाने के लिए प्लेट में कुछ धर दो। बस बच्चा भी खुश और व्यस्त और माता-पिता आराम से अपना अपना काम निपटा सकते हैं।
अब यहाँ पर एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया। अपनी ही काल्पनिक दुनिया में मगन रहना बचपन का एक अभिन्न अंग है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी बच्चो के नैसर्गिक मानसिक विकास लिए यह ज़रूरी माना जाता है। अत्यधिक दृश्य इनपुट्स से बच्चों की स्वाभाविक परिकल्पना की प्रवृत्ति में बाधा पड़ सकती है।
एक उदाहरण यह दिया गया कि मान लीजिये हम कुछ बच्चों को बिठाकर एक कहानी सुनाते है जिसमे किसी राक्षस ,भूत ,चुड़ैल या जिन्न का जिक्र करते हैं। इसे सुनते समय हर बच्चा अपने अपने मन में इस राक्षस या भूत की अलग अलग छवि की परिकल्पना करेगा। हर बच्चे के मन में अलग सोच होगी। लेकिन अगर किसी फेयरी टेल की डीवीडी दिखाएंगे तो उसमे चुड़ैल एक निश्चित रूप (चित्रकार की कल्पनानुसार ) में दिखाई देगा और सारे बच्चे इसी रूप को आत्मसात कर लेंगे। आगे किसी और कहानी में भी जब चुड़ैल का जिक्र आएगा तो बच्चों के मन में वही छवि सामने आएगी। अपनी सहज स्वाभाविक कल्पना की कोई गुंजाईश ही नहीं रहेगी ।
इस तरह से क्या हम बच्चों की कल्पना करने की प्रवृत्ति को धक्का तो नहीं पहुंचा नहीं रहे हैं?
इसीसे मुझे याद आया मेरे एक जर्मन साथी की बात जो उसने मुझे पैंतीस साल पहले कही थी। उसका कहना था कि बच्चों को कोई परिष्कृत खिलौना नहीं देना चाहिए। इससे उन की रचनात्मक प्रवृति पनपने नहीं पाती। अगर उसे एक बैटरी ऑपरेटेड एम्बुलेंस लेकर देंगे तो उसे कुछ और सोचने की गुंजाईश नहीं बचेगी। बच्चे के हाथ बस एक खाली डिब्बा दे दीजिये। वह उसे लेकर घंटों गुजर देगा। कभी वह उसे कुर्सी बना लेगा तो कभी मेज ,कभी छोटे से घर की कल्पना कर सकता है या धक्का देकर उसकी गाड़ी बना लेगा। सैकड़ो विकल्प निकाल सकता है जिसकी हम वयस्क कल्पना तक नहीं कर सकते। पर एक बार खिलौना एम्बुलेंस बन गया तो बस आगे कोई स्कोप ही नहीं रहा। कई लोगों का अनुभव कहता है कि कितने भी खिलोने ले दो पर उनके बच्चों का घर की रोज़मर्रा की वस्तुएं जैसे रसोई के बर्तन,झाड़ू ,तकिया वगैरह ने सबसे ज़्यादा मनोरंजन किया है?।
आप का क्या विचार है ?
इस तरह से क्या हम बच्चों की कल्पना करने की प्रवृत्ति को धक्का तो नहीं पहुंचा नहीं रहे हैं?
इसीसे मुझे याद आया मेरे एक जर्मन साथी की बात जो उसने मुझे पैंतीस साल पहले कही थी। उसका कहना था कि बच्चों को कोई परिष्कृत खिलौना नहीं देना चाहिए। इससे उन की रचनात्मक प्रवृति पनपने नहीं पाती। अगर उसे एक बैटरी ऑपरेटेड एम्बुलेंस लेकर देंगे तो उसे कुछ और सोचने की गुंजाईश नहीं बचेगी। बच्चे के हाथ बस एक खाली डिब्बा दे दीजिये। वह उसे लेकर घंटों गुजर देगा। कभी वह उसे कुर्सी बना लेगा तो कभी मेज ,कभी छोटे से घर की कल्पना कर सकता है या धक्का देकर उसकी गाड़ी बना लेगा। सैकड़ो विकल्प निकाल सकता है जिसकी हम वयस्क कल्पना तक नहीं कर सकते। पर एक बार खिलौना एम्बुलेंस बन गया तो बस आगे कोई स्कोप ही नहीं रहा। कई लोगों का अनुभव कहता है कि कितने भी खिलोने ले दो पर उनके बच्चों का घर की रोज़मर्रा की वस्तुएं जैसे रसोई के बर्तन,झाड़ू ,तकिया वगैरह ने सबसे ज़्यादा मनोरंजन किया है?।
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