जब भी मेरा प्रकृति के विशाल रूप से आमना सामना होता है तो एक अजीब सी अनुभूति होती है। जैसे विस्तृत नभ मंडल ,लहराता हुआ अथाह सागर ,गगनचुम्बी हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखला इत्यादि। ऐसे विस्तृत व विशाल दृश्य को देखकर कुछ अनिर्वचनीय सी अनुभुति होती है। अचानक मुझे अपनी हस्ती ,अपनी समस्याएं बहुत तुच्छ मालूम पडने लगती हैं। अगर हम पूरे ब्रह्माण्ड की बात कारें तो हमारी तो दूर की बात है ,पूरी पृथ्वी की हस्ती ऐक बिंदु से अधिक नहीँ है।
सम्पूर्ण मानव जाति ,पशु पक्क्षी ,पेड़ पौधे ,जीव जंतु ,कीड़े मकोड़े ,सारी धरती एक सूत्र में बंधे हुए हैं। हम सब एक दूसरे पर आत्म निर्भर हैं। इन सब में केवल मानव जाति को सोचने और समझने की क्षमता प्राप्त है जिसे कि वो कई बार अपने स्वार्थ के लिए अनुचित रूप से ऊपयोग करके प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने में लगा हुआ है. समस्त विश्व के देश हथियारों की होड़ में लगे है , अवसर मिलते ही एक दूसरे पर उनका उपयोग करने के लिए तैयार बैठे हैं।
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