अभी पिछले ही महीने क्रिसमस के मौके पर करीब पच्चीस साल पहले की क्रिसमस की अनायास ही याद हो आयी.
हमारी श्रीमतीजी केक, बिस्कुट वगैरह बनाने का शौक रखती हैं. पर केक खाना उतना पसंद नहीं है. मैंने कहा बस तुम केक बनाते रहो और मैं खाता रहूँ तो जीने का मज़ा कुछ और आएगा. खैर ,उस साल यह तय रहा की प्लम केक जो क्रिसमस पर विशेष रूप से बनाने की प्रथा है ,बनेगा।पर यहाँ एक बहुत बड़ी दिक्कत सामने आई.इस केक में 'रम ' पड़ता है. वैसे रम के एसेंस से भी काम चलाया जा सकता है पर असली चीज़ का मज़ा ही कुछ और है। अब हम जैसे तथा कथित सुसंस्कृत परिवार में शराब का नाम लेना भी वर्जित था. तो अब रम कौन, कैसे और कहाँ से लाये ? बड़ी गंभीर समस्या थी.
कोई भी उलटा सीधा काम हो तो अपने सर ही आता है तो लाना तो मुझे ही था. किसी बाहरी व्यक्ति की सहायता का जोखिम उठाने का सवाल ही नहीं था.
आजकल शराब तो धड़ल्ले से कोने कोने में मिल जाती है. चाहे आटा ,चावल या दूध बगल की दुकान में न मिले पर दारू के दुकानों की कमी नहीं ,एक ढूंढो हज़ार मिल जायेंगे. तो कहाँ से लाएं ,इसके कई विकल्प थे.
मगर असली मुश्किल यह थी कि कैसे लाएं. पास में ही एक दारू की दूकान और उससे लगा हुआ बार भी था. अब अगर मेरी तरह एक 'संभ्रांत ' (आखिर बन्दा भारतीय सरकार के एक उन्नत उपक्रम में उच्च पदाधिकारी था) व्यक्ति बार के आसपास पाया गया तो हमारी कॉलोनी में तहलका मच जायेगा. में अभी इसी कश्मकश में में ग्रस्त था की हमारी सुपुत्री ने फरमान जारी किया कि आप किसी भी कीमत पर बार में नहीं जायेंगे .अब हमने पूछा भई तुमको क्या परेशानी है.?उसने फ़रमाया कि अगर उसकी किसी सहपाठी ने मुझे वहां देख लिया तो अगले दिन स्कूल में ढिंढोरा पिट जायेगा की उसके पिताजी पियक्कड़ हैं.
बड़ी दुविधा थी. एक सलाह कहीं से आई कि मैं एक ऐसा हेलमेट, जो पूरा मुँह ढक ले, पहन कर जाऊँ या डकैतों वाला मास्क पहन कर जाऊं. पर मुझे इस तरह फैंसी ड्रेस में जाना बिलकुल नहीं जँचा।
मैंने प्लान बनाया कि अँधेरा होते ही फटाफट जाकर ले आऊँ। जैसे तैसे हिम्मत करके बार में घुसा।काउंटर वाले ने मुझे इस घूर कर देखा और एकदम पहचान लिया क्यूंकि बगल वाली बेकरी में उसने मुझे कई बार देखा था.मुझे लगा, उसकी निगाहें कह रही हैं अच्छा तो आप भी। मैंने जल्दी से बिना उसकी तरफ देखे आर्डर दिया जल्दी से रम दे दो. उसने पूछा "क्या यहीं लेंगे". पहले तो मेरे समझ में नहींआया पर थोड़ी देर में दिमाग की घंटी बजी. वह जानना चाहता था क्या मैं काउंटर पर खड़े खड़े ही रम चढ़ाना चाहता था. मैंने घबरा कर जल्दी से कहा नहीं भई जल्दी से एक बोतल पैक करदो. उसने शेल्फ से एक बोतल निकाल कर दिखाई और पूछा "क्या यह ठीक रहेगी?". मैंने लेबल को पढ़कर कहा नहीं भई ,हमारी श्रीमतीजी को सिर्फ ओल्ड मोंक ही चलेगी. सुनकर वह मुस्कुराया जैसे कह रहा हो "अच्छा तो मैडम भी शौक फरमाती हैं". उसने दूसरी बोतल निकाल कर पैक की,मैंने काउंटर पर पैसे पटके और वहां से घर को लपका.
घर पहुँच कर मैंने बड़े शान से पैकेट को श्रीमतीजी को थमाया। आखिर यह काम किसी मैदान मारने से काम तो नहीं था.
मगर यह क्या ! पैकेट खोलते ही श्रीमतीजी का चेहरा बुझ गया। मैंने घबरा कर पूछा क्यों सब ठीक तो है।
"यह तो छोटी साइज की बोतल है। इसमें मैं मनीप्लांट कैसे उगाऊँगी ?
लो करलो बात। एक तो हम सर पे कफ़न बांध कर तूफ़ान से कश्ती निकाल कर लाये ,और यहाँ इन्हे मनीप्लांट की पड़ी है।